Vijñāna Bhairava Tantra · 1.47

Vijñāna Bhairava Tantra 1.47

1.47
यत्र यत्र मनो याति बाह्ये वाभ्यन्तरेऽपि वा । तत्र तत्र शिवावस्था व्यापकत्वात्क्व यास्यति ॥४७॥
yatra yatra mano yāti bāhye vābhyantare'pi vā | tatra tatra śivāvasthā vyāpakatvāt kva yāsyati
anuṣṭubh
— जहाँ-जहाँ (अव्यय-युग्म) ; — मन (कर्ता कारक) ; — जाता है (वर्तमान काल) ; — बाहर (अधिकरण कारक) ; — अथवा (अव्यय) ; — भीतर (अधिकरण कारक) ; — अथवा भी (अव्यय-युग्म) ; — वहाँ-वहाँ (अव्यय-युग्म) ; — शिव-अवस्था (कर्ता कारक — समासगत) ; — व्यापकता के कारण (अपादान कारक) ; — कहाँ जा सकता है? (प्रश्न + भविष्यत् काल)

मन जहाँ-जहाँ जाता है — बाहर हो या भीतर — वहाँ-वहाँ शिव-अवस्था (विद्यमान) है; (शिव के) व्यापक होने से (मन) कहाँ जा सकता है? (धारणा २९)