Vijñāna Bhairava Tantra · 1.49

Vijñāna Bhairava Tantra 1.49

1.49
क्षुताद्यन्ते भये शोके गह्वरे वा रणाद्द्रुते । कुतूहले क्षुधाद्यन्ते ब्रह्मसत्तासमीपगा ॥४९॥
kṣutādyante bhaye śoke gahvare vā raṇād drute | kutūhale kṣudhādyante brahmasattāsamīpagā
anuṣṭubh
— क्षुधा आदि के अन्त में (अधिकरण — समासगत) ; — भय में (अधिकरण कारक) ; — शोक में (अधिकरण कारक) ; — गहन (विषाद) में (अधिकरण कारक) ; — अथवा (अव्यय) ; — युद्ध से भागते समय (अपादान + विशेषण) ; — कुतूहल (विस्मय) में — अधिकरण कारक ; — क्षुधा आदि के अन्त में (अधिकरण — समासगत) ; — ब्रह्म-सत्ता के समीप पहुँचने वाली (अवस्था) — कर्ता कारक स्त्रीलिङ्ग — समासगत

क्षुधा आदि के अन्त में, भय में, शोक में, गहन (विषाद) में, युद्ध से भागते समय, कुतूहल (विस्मय) में, और क्षुधा आदि के अन्त में — (चित्त) ब्रह्म-सत्ता के समीप पहुँचता है। (धारणा ३१)