Vijñāna Bhairava Tantra · 1.11

Vijñāna Bhairava Tantra 1.11

1.11
तदा तस्मिन्महाव्योम्नि प्रलीने शशिभास्करे । मग्नवत्तामसी निद्रा बभूव खिलगोचरे ॥११॥
tadā tasmin mahāvyomni pralīne śaśibhāskare | magnavat tāmasī nidrā babhūva khilagocare
anuṣṭubh
— तब (अव्यय) ; — उस महा-व्योम (महा-शून्य) में (अधिकरण कारक — समासगत) ; — प्रलीन होने पर (सति-सप्तमी, कर्मवाच्य भूत कृदन्त) ; — चन्द्र और सूर्य के (प्रलीन होने पर) — समासगत अधिकरण ; — मानो डूबे हुए की भाँति (विशेषण) ; — तामसी निद्रा, अन्धकारयुक्त सुषुप्ति (कर्ता कारक) ; — हो जाती है, उत्पन्न हो गई (परोक्ष भूत) ; — गोचर के लोप होने पर, शून्य गोचर में (अधिकरण — समासगत)

तब उस महाव्योम (महा-शून्य) में जब चन्द्र और सूर्य (इडा-पिङ्गला) प्रलीन हो जाते हैं, तब समस्त गोचर के लुप्त हो जाने पर मानो डूबे हुए की भाँति तामसी निद्रा-सी अवस्था हो जाती है।