The Essence of the Tantra· 8.49 / 93

The Essence of the Tantra8.49

8.49

न च अवैराग्यकृतं तत् अवैराग्यस्यापि अरक्तिदर्शनात्

Transliteration (IAST)

na ca avairāgyakṛtaṃ tat avairāgyasyāpi araktidarśanāt

— अवैराग्य से कृत (उत्पन्न) ; — अवैराग्य का ; — अरक्ति (अनासक्ति) के दर्शन के कारण

और वह (राग) अवैराग्य से कृत नहीं है, क्योंकि अवैराग्य में भी अरक्ति (अनासक्ति) का दर्शन होता है।