The Essence of the Tantra· 8.37 / 93

The Essence of the Tantra8.37

8.37

तत्र मायातः कला जाता या सुप्तस्थानीयम् अणुं किञ्चित्कर्तृत्वेन युनक्ति सा च उच्छूनतेव संसारबीजस्य मायाण्वोर् उभयोः संयोगात् उत्पन्नापि मायां विकरोति न अविकार्यम् अणुम् इति मायाकार्यत्वम् अस्याः

Transliteration (IAST)

tatra māyātaḥ kalā jātā yā suptasthānīyam aṇuṃ kiñcitkartṛtvena yunakti sā ca ucchūnateva saṃsārabījasya māyāṇvor ubhayoḥ saṃyogāt utpannāpi māyāṃ vikaroti na avikāryam aṇum iti māyākāryatvam asyāḥ

— माया से ; — कला (सीमित कर्तृत्व) ; — सुप्त-स्थानीय — सोये हुए सदृश (निष्क्रिय) ; — किञ्चित्-कर्तृत्व से (सीमित कर्तृत्व से) ; — युक्त करती है, जोड़ती है ; — उच्छूनता — फूलना, उभरना ; — संसार-बीज की ; — माया और अणु के संयोग से ; — विकृत करती है, रूपान्तरित करती है ; — माया-कार्यत्व — माया का कार्य होने की दशा

उसमें माया से कला उत्पन्न होती है, जो सुप्त-स्थानीय (सोये हुए सदृश) अणु को किञ्चित्-कर्तृत्व से युक्त करती है; और वह संसार-बीज की मानो उच्छूनता (फूलन) है। माया और अणु — दोनों के संयोग से उत्पन्न होने पर भी वह माया को विकृत करती है, अविकार्य अणु को नहीं — अतः इसका माया-कार्यत्व (माया का कार्य होना) है।