The Essence of the Tantra· 6.58 / 82

The Essence of the Tantra6.58

6.58

यथा च हृत्कण्ठतालुललाटरन्ध्रद्वादशान्तेषु ब्रह्मविष्णुरुद्रेशसदाशिवानाश्रिताख्यं कारणषट्कम् तथैव अपाने ऽपि हृत्कन्दानन्दसङ्कोचविकासद्वादशान्तेषु बाल्ययौवनवार्द्धकनिधनपुनर्भवमुक्त्यधिपतय एते

Transliteration (IAST)

yathā ca hṛtkaṇṭhatālulalāṭarandhradvādaśānteṣu brahmaviṣṇurudreśasadāśivānāśritākhyaṃ kāraṇaṣaṭkam tathaiva apāne 'pi hṛtkandānandasaṅkocavikāsadvādaśānteṣu bālyayauvanavārddhakanidhanapunarbhavamuktyadhipataya ete

— हृदय, कण्ठ, तालु, ललाट, (कपाल-)रन्ध्र एवं द्वादशान्त में ; — ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश, सदाशिव एवं अनाश्रित नामक ; — कारण-षट्क — छह कारण-देवता ; — हृदय, कन्द, आनन्द, संकोच, विकास एवं द्वादशान्त में ; — बाल्य, यौवन, वार्धक्य, निधन, पुनर्भव एवं मुक्ति के अधिपति

और जैसे हृदय, कण्ठ, तालु, ललाट, रन्ध्र एवं द्वादशान्त में ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश, सदाशिव एवं अनाश्रित नामक कारण-षट्क है, वैसे ही अपान में भी हृदय, कन्द, आनन्द, संकोच, विकास एवं द्वादशान्त में ये बाल्य, यौवन, वार्धक्य, निधन, पुनर्भव एवं मुक्ति के अधिपति हैं।