The Essence of the Tantra· 6.29 / 82

The Essence of the Tantra6.29

6.29

चतुर्युगानाम् एकसप्तत्या मन्वन्तरम् मन्वन्तरैः चतुर्दशभिः ब्राह्मं दिनं ब्रह्मदिनान्ते कालाग्निदग्धे लोकत्रये अन्यत्र च लोकत्रये धूमप्रस्वापिते सर्वे जना वेगवद् अग्निप्रेरिता जनलोके प्रलयाकलीभूय तिष्ठन्ति

Transliteration (IAST)

caturyugānām ekasaptatyā manvantaram manvantaraiḥ caturdaśabhiḥ brāhmaṃ dinaṃ brahmadinānte kālāgnidagdhe lokatraye anyatra ca lokatraye dhūmaprasvāpite sarve janā vegavad agnipreritā janaloke pralayākalībhūya tiṣṭhanti

— इकहत्तर चतुर्युगों से ; — मन्वन्तर — एक मनु का काल ; — चौदह से ; — ब्राह्म दिन — ब्रह्मा का एक दिन ; — कालाग्नि से दग्ध ; — लोकत्रय में (तीन लोकों में) ; — धूम से प्रस्वापित (सुलाया गया) ; — वेगपूर्वक अग्नि से प्रेरित ; — जनलोक में ; — प्रलयाकल बनकर (प्रलय में सुप्त जीव) ; — स्थित रहते हैं

इकहत्तर चतुर्युगों से एक मन्वन्तर; चौदह मन्वन्तरों से एक ब्राह्म दिन (होता है)। ब्रह्मा के दिन के अन्त में, कालाग्नि से दग्ध लोकत्रय में, तथा अन्य लोकत्रय के धूम से प्रस्वापित (सुलाये जाने) पर, सभी जन वेगपूर्वक अग्नि से प्रेरित होकर प्रलयाकल बनकर जनलोक में स्थित रहते हैं।