The Essence of the Tantra· 22.7 / 53

The Essence of the Tantra22.7

22.7

सिद्धिकामस्य द्वितीयतुर्यपञ्चमाः सर्वथा निर्वर्त्याः षष्ठस् तु मुमुक्षोः मुख्यः तस्यापि द्वितीयाद्या नैमित्तिके यथासम्भवम् अनुष्ठेया एव विधिपूरणार्थं च

Transliteration (IAST)

siddhikāmasya dvitīyaturyapañcamāḥ sarvathā nirvartyāḥ ṣaṣṭhas tu mumukṣoḥ mukhyaḥ tasyāpi dvitīyādyā naimittike yathāsambhavam anuṣṭheyā eva vidhipūraṇārthaṃ ca

— सिद्धि के अभिलाषी के लिए ; — द्वितीय, तुर्य एवं पञ्चम (याग) ; — सर्वथा निर्वर्त्य (अनुष्ठेय) ; — किन्तु षष्ठ मुमुक्षु के लिए मुख्य ; — उसके लिए भी द्वितीय आदि ; — नैमित्तिक (अवसर) पर ; — यथासम्भव अनुष्ठेय ; — विधि की पूर्ति के लिए

सिद्धि के अभिलाषी के लिए द्वितीय, तुर्य (चतुर्थ) एवं पञ्चम (याग) सर्वथा निर्वर्त्य (अनुष्ठेय) हैं; किन्तु षष्ठ मुमुक्षु के लिए मुख्य है। उसके (मुमुक्षु के) लिए भी द्वितीय आदि (याग), नैमित्तिक (अवसर) पर यथासम्भव अनुष्ठेय ही हैं — विधि की पूर्ति के लिए भी।