The Essence of the Tantra· 21.9 / 13

The Essence of the Tantra21.9

21.9

सन्तः समस्तमयचित्प्रतिभाविमर्शसारं समाश्रयत शास्त्रम् अनुत्तरात्म

Transliteration (IAST)

santaḥ samastamayacitpratibhāvimarśasāraṃ samāśrayata śāstram anuttarātma

— हे सन्तजनो, जो तुम ; — समस्त-मय चित्-प्रतिभा के विमर्श रूप सार वाले ; — आश्रय लो, शरण लो ; — अनुत्तर-आत्मक शास्त्र

हे सन्तजनो, समस्त-मय चित्-प्रतिभा के विमर्श रूप सार वाले, अनुत्तर-आत्मक शास्त्र का सम्यक् आश्रय लो।