The Essence of the Tantra· 21.8 / 13

The Essence of the Tantra21.8

21.8

संवित्प्रकाशपरमार्थतया यथैव भात्य् आमृशत्य् अपि तथेति विवेचयन्तः

Transliteration (IAST)

saṃvitprakāśaparamārthatayā yathaiva bhāty āmṛśaty api tatheti vivecayantaḥ

— संवित्-प्रकाश के परमार्थ रूप से ; — जैसे ही (विश्व) भासित होता है ; — वैसे ही (वह स्वयं को) आमर्श भी करता है ; — इस प्रकार विवेचन करते हुए

संवित्-प्रकाश के परमार्थ रूप से, जैसे ही (विश्व) भासित होता है वैसे ही (वह स्वयं को) आमर्श (विमर्श) भी करता है — इस प्रकार विवेचन करते हुए,