The Essence of the Tantra· 20.19 / 65

The Essence of the Tantra20.19

20.19

मुख्यं नैवेद्यं स्वयम् अश्नीयात् सर्वं वा जले क्षिपेत् जलजा हि प्राणिनः पूर्वदीक्षिताः चरुभोजनद्वारेण इति आगमविदः

Transliteration (IAST)

mukhyaṃ naivedyaṃ svayam aśnīyāt sarvaṃ vā jale kṣipet jalajā hi prāṇinaḥ pūrvadīkṣitāḥ carubhojanadvāreṇa iti āgamavidaḥ

— मुख्य नैवेद्य ; — स्वयं खाये ; — अथवा सब जल में क्षिप्त करे ; — जलज (जल में उत्पन्न) प्राणी ; — (इससे) दीक्षित (हो जाते हैं) ; — चरु-भोजन के द्वारा ; — आगमविद् (शास्त्र-ज्ञाता, ऐसा कहते हैं)

मुख्य नैवेद्य को स्वयं खाये, अथवा सब जल में क्षिप्त करे; क्योंकि जलज (जल में उत्पन्न) प्राणी चरु-भोजन के द्वारा पूर्व-दीक्षित (दीक्षा-प्राप्त) हो जाते हैं — ऐसा आगमविद् (कहते हैं)।