The Essence of the Tantra· 20.20 / 65

The Essence of the Tantra20.20

20.20

मार्जारमूषकश्वादिभक्षणे तु शङ्का जनिता निरयाय इति ज्ञानी अपि लोकानुग्रहेच्छया न तादृक् कुर्यात् लोकं वा परित्यज्य आसीत इति स्थण्डिलयागः

Transliteration (IAST)

mārjāramūṣakaśvādibhakṣaṇe tu śaṅkā janitā nirayāya iti jñānī api lokānugrahecchayā na tādṛk kuryāt lokaṃ vā parityajya āsīta iti sthaṇḍilayāgaḥ

— मार्जार (बिल्ली), मूषक (चूहा), श्वान आदि के भक्षण में ; — उत्पन्न शंका ; — निरय (नरक) के लिए ; — ज्ञानी भी ; — लोक-अनुग्रह की इच्छा से ; — वैसा न करे ; — अथवा लोक (जन-समुदाय) को परित्याग कर एकान्त में रहे ; — स्थण्डिल-याग (वेदी-पूजन)

किन्तु मार्जार (बिल्ली), मूषक (चूहा), श्वान आदि के द्वारा भक्षण में उत्पन्न शंका निरय (नरक) के लिए (होती है) — अतः ज्ञानी भी लोक-अनुग्रह की इच्छा से वैसा न करे, अथवा लोक (जन-समुदाय) को परित्याग कर एकान्त में रहे — यह स्थण्डिल-याग है।