The Essence of the Tantra· 13.59 / 101

The Essence of the Tantra13.59

13.59

ततः अग्निकुण्डं परमेश्वरशक्तिरूपतया भावयित्वा तत्र अग्निं प्रज्वाल्य हृदयान्तर्बोधाग्निना सह एकीकृत्य मन्त्रपरामर्शसाहित्येन ज्वलन्तं शिवाग्निं भावयित्वा तत्र न्यस्य अभ्यर्च्य मन्त्रान् तर्पयेत् आज्येन तिलैश् च

Transliteration (IAST)

tataḥ agnikuṇḍaṃ parameśvaraśaktirūpatayā bhāvayitvā tatra agniṃ prajvālya hṛdayāntarbodhāgninā saha ekīkṛtya mantraparāmarśasāhityena jvalantaṃ śivāgniṃ bhāvayitvā tatra nyasya abhyarcya mantrān tarpayet ājyena tilaiś ca

— अग्नि-कुण्ड ; — परमेश्वर-शक्ति-रूप (भावित कर) ; — अग्नि प्रज्वलित कर ; — हृदय के भीतर के बोध-अग्नि के साथ ; — एकीकृत कर ; — मन्त्र-परामर्श की साहित्यता से ; — ज्वलित शिव-अग्नि ; — मन्त्रों को तर्पित करे ; — आज्य (घी) एवं तिलों से

फिर अग्नि-कुण्ड को परमेश्वर-शक्ति-रूप भावित कर, वहाँ अग्नि प्रज्वलित कर, हृदय के भीतर के बोध-अग्नि के साथ एकीकृत कर, मन्त्र-परामर्श की साहित्यता से ज्वलित शिव-अग्नि भावित कर, वहाँ (देवताओं को) न्यस्त कर, अर्चन कर, मन्त्रों को आज्य (घी) एवं तिलों से तर्पित करे।