The Essence of the Tantra· 13.45 / 101

The Essence of the Tantra13.45

13.45

तत्र सर्वोपकरणपूर्णं यागगृहं विधाय भगवतीं मालिनीं मातृकां वा स्मृत्वा तद्वर्णतेजःपुञ्जभरितं गृहीतं भावयन् पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्

Transliteration (IAST)

tatra sarvopakaraṇapūrṇaṃ yāgagṛhaṃ vidhāya bhagavatīṃ mālinīṃ mātṛkāṃ vā smṛtvā tadvarṇatejaḥpuñjabharitaṃ gṛhītaṃ bhāvayan puṣpāñjaliṃ kṣipet

— समस्त उपकरणों से पूर्ण ; — याग-गृह बनाकर ; — मालिनी अथवा मातृका (वर्ण-देवियाँ) ; — स्मरण कर ; — उन वर्णों के तेज-पुञ्ज से भरित ; — गृहीत (वैसे भरित) भावना करता हुआ ; — पुष्पाञ्जलि क्षिप्त करे

वहाँ समस्त उपकरणों से पूर्ण याग-गृह बनाकर, भगवती मालिनी अथवा मातृका का स्मरण कर, उन वर्णों के तेज-पुञ्ज से भरित-गृहीत भावना करता हुआ पुष्पाञ्जलि क्षिप्त करे।