Stanzas on the Divine Pulsation · 2.1

Stanzas on the Divine Pulsation 2.1

2.1
तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः । प्रवर्तन्तेऽधिकारायं करणानीव देहिनाम् ॥१॥
tad ākramya balaṃ mantrāḥ sarvajña-bala-śālinaḥ | pravartante 'dhikārāyaṃ karaṇānīva dehinām ||
anuṣṭubh
— उस (स्पन्द) बल का अवलम्बन लेकर (पूर्वकालिक क्रिया-पदबन्ध) ; — मन्त्र (कर्ता कारक बहुवचन) ; — सर्वज्ञ-बल से सम्पन्न (कर्ता कारक बहुवचन — समासगत) ; — प्रवृत्त होती हैं, उद्यत होती हैं (वर्त. तृ.पु.बहु., √प्र-वृत्) ; — अपने नियत अधिकार (कार्य) के लिए (सम्प्रदान कारक) ; — यह (अर्थात् मन्त्र-गण) — पु.कर्ता एक. ; — (इन्द्रिय-)करणों की भाँति (पदबन्ध) ; — देहधारियों के — पु.षष्ठी बहु.

उस (स्पन्द) बल का अवलम्बन लेकर सर्वज्ञ-बल से सम्पन्न मन्त्र अपने अधिकार (नियुक्त कार्य) में प्रवृत्त होते हैं — जैसे देहधारियों के लिए (इन्द्रिय-)करण प्रवृत्त होते हैं।