Stanzas on the Divine Pulsation · 1.25

Stanzas on the Divine Pulsation 1.25

1.25
तदा तस्मिन्महाव्योम्नि प्रलीनशशिभास्करे । सौषुप्तपदवन्मूढः प्रबुद्धः स्यादनावृतः ॥२५॥
tadā tasmin mahā-vyomni pralīna-śaśi-bhāskare | sauṣupta-padavan mūḍhaḥ prabuddhaḥ syād anāvṛtaḥ ||
anuṣṭubh
— तब (कालवाचक नित्यसम्बन्धी अव्यय) ; — उसमें — नपुं.अधिकरण एक. ; — महाव्योम — चैतन्य का महान आकाश (अधिकरण कारक — समासगत) ; — जिसमें शशि (चन्द्र) और भास्कर (सूर्य) विलीन हो गए हैं (अधिकरण कारक — समासगत) ; — सुषुप्ति-पद के समान (अव्यय) ; — मूढ़, अज्ञानी (कर्ता कारक) ; — प्रबुद्ध, जागृत (कर्ता कारक) ; — हो, हो सकता है (विधिलिङ्ग, तृ.पु.एक. √अस्) ; — अनावृत, अनाच्छादित, पूर्ण-प्रकाशमान (विशेषण, कर्ता कारक)

तब उस महाव्योम (चैतन्य-आकाश) में, जहाँ शशि (चन्द्र) और भास्कर (सूर्य) विलीन हो चुके हैं — मूढ़ (अज्ञानी) उसे सौषुप्त-पद के समान (शून्य) अनुभव करता है, परन्तु प्रबुद्ध (जागृत) अनावृत (अनाच्छादित) रहता है।