नैवं यतो हि भावानां विनाशेऽस्मासु नेष्टता ॥५६॥
naivaṃ yato hi bhāvānāṃ vināśe'smāsu neṣṭatā
ऐसा (वास्तविक दुविधा) नहीं — क्योंकि हमारे (मत में) भावों के विनाश की स्वीकृति नहीं (सब शिव रूप में अवस्थित है)।
ऐसा (वास्तविक दुविधा) नहीं — क्योंकि हमारे (मत में) भावों के विनाश की स्वीकृति नहीं (सब शिव रूप में अवस्थित है)।