The Vision of Śiva· 3.50 / 99

The Vision of Śiva3.50

3.50
सत्कृतौ तद्विनिर्णेयं या चोल्लङ्घनचोदना ॥५०॥
satkṛtau tadvinirṇeyaṃ yā collaṅghanacodanā
— सत्कार (रिति) में ; — वही ; — निर्णीत करना चाहिए ; — जो ; — और ; — उल्लंघन का (निषेध-) विधान

(देवता के) सत्कार के विषय में भी वही (सिद्धान्त) निर्णीत करना चाहिए, और जो उल्लंघन (अतिक्रमण) का (निषेध-) विधान है (उसका भी)।