सत्कृतौ तद्विनिर्णेयं या चोल्लङ्घनचोदना ॥५०॥
satkṛtau tadvinirṇeyaṃ yā collaṅghanacodanā
(देवता के) सत्कार के विषय में भी वही (सिद्धान्त) निर्णीत करना चाहिए, और जो उल्लंघन (अतिक्रमण) का (निषेध-) विधान है (उसका भी)।
(देवता के) सत्कार के विषय में भी वही (सिद्धान्त) निर्णीत करना चाहिए, और जो उल्लंघन (अतिक्रमण) का (निषेध-) विधान है (उसका भी)।