अन्तः क्रमो हृदादेश्चेत्प्राणादेः किं न सत्यता ॥१४॥
antaḥ kramo hṛdādeścetprāṇādeḥ kiṃ na satyatā
यदि (पश्यन्ती का) आन्तरिक क्रम हृदय आदि का है, तो प्राण आदि की सत्यता क्यों नहीं?
यदि (पश्यन्ती का) आन्तरिक क्रम हृदय आदि का है, तो प्राण आदि की सत्यता क्यों नहीं?