Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.26 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.26

6.26
शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया । आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥ ६-२६ ॥
śanaiḥ śanairuparamedbuddhyā dhṛtigṛhītayā | ātmasaṃsthaṃ manaḥ kṛtvā na kiñcidapi cintayet || 6-26 ||
— धीरे-धीरे उपराम हो ; — धैर्य से युक्त बुद्धि से ; — मन को आत्मा में स्थित करके ; — कुछ भी न सोचे

धैर्य से युक्त बुद्धि के द्वारा धीरे-धीरे उपराम हो; मन को आत्मा में स्थित करके कुछ भी न सोचे।