Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 3.25 / 48

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)3.25

3.25
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत । कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥ ३-२५ ॥
saktāḥ karmaṇyavidvāṃso yathā kurvanti bhārata | kuryādvidvāṃstathāsaktaścikīrṣurlokasaṃgraham || 3-25 ||
— कर्म में आसक्त अज्ञानी ; — जैसे करते हैं, हे भारत ; — वैसे ही विद्वान् अनासक्त होकर करे ; — लोकसंग्रह की इच्छा रखता हुआ

हे भारत, जैसे आसक्त अज्ञानी कर्म करते हैं, वैसे ही विद्वान् लोकसंग्रह की इच्छा रखता हुआ अनासक्त होकर कर्म करे।