Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 18.55 / 78

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)18.55

18.55
भक्त्या मामभिजानाति योऽहं यश्चास्मि तत्त्वतः । ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥ १८-५५ ॥
bhaktyā māmabhijānāti yo'haṃ yaścāsmi tattvataḥ | tato māṃ tattvato jñātvā viśate tadanantaram || 18-55 ||
— भक्ति से मुझे भली-भाँति जानता है ; — जो मैं हूँ और जैसा तत्त्व से हूँ ; — फिर मुझे तत्त्व से जानकर ; — तत्काल (मुझमें) प्रवेश करता है

भक्ति से वह मुझे, जो मैं हूँ और जैसा तत्त्व से हूँ, भली-भाँति जान लेता है; फिर मुझे तत्त्व से जानकर तत्काल (मुझमें) प्रवेश करता है।