Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 18.54 / 78

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)18.54

18.54
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न हृष्यति । समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥ १८-५४ ॥
brahmabhūtaḥ prasannātmā na śocati na hṛṣyati | samaḥ sarveṣu bhūteṣu madbhaktiṃ labhate parām || 18-54 ||
— ब्रह्मभूत, प्रसन्न आत्मा ; — न शोक करता न हर्ष ; — समस्त भूतों में समान ; — मुझमें परम भक्ति को प्राप्त करता है

ब्रह्मभूत, प्रसन्न आत्मा वाला न शोक करता है, न हर्ष; समस्त भूतों में समान होकर वह मुझमें परम भक्ति को प्राप्त करता है।