Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 18.10 / 78

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)18.10

18.10
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते । त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥ १८-१० ॥
na dveṣṭyakuśalaṃ karma kuśale nānuṣajjate | tyāgī sattvasamāviṣṭo medhāvī chinnasaṃśayaḥ || 18-10 ||
— अकुशल (अप्रिय) कर्म से द्वेष नहीं करता ; — कुशल (प्रिय) में आसक्त नहीं होता ; — सत्त्व से युक्त त्यागी ; — मेधावी, संशयरहित

जो अकुशल (अप्रिय) कर्म से द्वेष नहीं करता और कुशल (प्रिय) कर्म में आसक्त नहीं होता — वह सत्त्व से युक्त, मेधावी, संशयरहित त्यागी है।