Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 17.3 / 28

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)17.3

17.3
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत । श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥ १७-३ ॥
sattvānurūpā sarvasya śraddhā bhavati bhārata | śraddhāmayo'yaṃ puruṣo yo yacchraddhaḥ sa eva saḥ || 17-3 ||
— सबके अन्तःकरण के अनुरूप ; — श्रद्धा होती है, हे भारत ; — श्रद्धामय यह पुरुष ; — जो जैसी श्रद्धा वाला, वह वैसा ही

हे भारत, सबकी श्रद्धा उसके अन्तःकरण के अनुरूप होती है; यह पुरुष श्रद्धामय है — जो जैसी श्रद्धा वाला है, वह वैसा ही है।