Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 17.2 / 28

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)17.2

17.2
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा । सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति ताः शृणु ॥ १७-२ ॥
trividhā bhavati śraddhā dehināṃ sā svabhāvajā | sāttvikī rājasī caiva tāmasī ceti tāḥ śṛṇu || 17-2 ||
— तीन प्रकार की होती है श्रद्धा ; — देहधारियों की, वह स्वभावजनित ; — सात्त्विकी और राजसी ; — और तामसी — इन्हें सुन

देहधारियों की वह स्वभावजनित श्रद्धा तीन प्रकार की होती है — सात्त्विकी, राजसी और तामसी; इन्हें सुन।