Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 14.9 / 27

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)14.9

14.9
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत । ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत ॥ १४-९ ॥
sattvaṃ sukhe sañjayati rajaḥ karmaṇi bhārata | jñānamāvṛtya tu tamaḥ pramāde sañjayatyuta || 14-9 ||
— सत्त्व सुख में आसक्त करता है ; — रजस् कर्म में, हे भारत ; — किन्तु तमस् ज्ञान को ढककर ; — प्रमाद में आसक्त करता है

हे भारत, सत्त्व सुख में आसक्त करता है, रजस् कर्म में; किन्तु तमस् ज्ञान को ढककर प्रमाद में आसक्त करता है।