The Great Liberation Tantra· 3.84 / 153

The Great Liberation Tantra3.84

3.84
आनीतं श्वपचेनापि श्वमुखादपि निःसृतम् । तदन्नं पावनं देवि देवानामपि दुर्लभम् ॥८४॥
ānītaṃ śvapacenāpi śvamukhādapi niḥsṛtam | tadannaṃ pāvanaṃ devi devānāmapi durlabham ||84||
— लाया गया ; — चाण्डाल द्वारा भी ; — कुत्ते के मुख से भी ; — निकला ; — वह अन्न ; — पावन ; — हे देवि ; — देवों के लिए भी ; — दुर्लभ

हे देवि, चाण्डाल द्वारा लाया गया हो, या कुत्ते के मुख से भी निकला हो — वह अन्न (ब्रह्म को अर्पित होने पर) पावन है, और देवों के लिए भी दुर्लभ है।