The Great Liberation Tantra· 3.85 / 153

The Great Liberation Tantra3.85

3.85
किं पुनर्मनुजादीनां वक्तव्यं देववन्दिते । परमेशस्य नैवेद्यसेवनाद् यत् फलं भवेत् ॥८५॥
kiṃ punarmanujādīnāṃ vaktavyaṃ devavandite | parameśasya naivedyasevanād yat phalaṃ bhavet ||85||
— क्या ; — फिर ; — मनुष्य आदि के विषय में ; — कहने योग्य ; — हे देववन्दिते ; — परमेश के ; — नैवेद्य के सेवन से ; — जो ; — फल ; — हो

हे देववन्दिते, फिर मनुष्य आदि के विषय में क्या कहना — परमेश के नैवेद्य के सेवन से जो फल होता है (उसका वर्णन)?