The Great Liberation Tantra· 3.66 / 153

The Great Liberation Tantra3.66

3.66
इति ते कथितं देवि पञ्चरत्नं महेशितुः । कवचं शृणु चार्वङ्गि जगन्मङ्गलनामकम् । पठनाद्धारणाद् यस्य ब्रह्मज्ञो जायते ध्रुवम् ॥६६॥
iti te kathitaṃ devi pañcaratnaṃ maheśituḥ | kavacaṃ śṛṇu cārvaṅgi jaganmaṅgalanāmakam | paṭhanāddhāraṇād yasya brahmajño jāyate dhruvam ||66||
— इस प्रकार ; — तुम्हें ; — कहा गया ; — हे देवि ; — 'पंचरत्न' ; — महेश का ; — कवच को ; — सुनो ; — हे चारु-अंगि ; — 'जगन्मंगल' नामक ; — जिसके पाठ या धारण से ; — ब्रह्मज्ञ ; — हो जाता है ; — निश्चय ही

हे देवि, इस प्रकार महेश का 'पंचरत्न' तुम्हें कह दिया। हे चारु-अंगि, अब 'जगन्मंगल' नामक कवच सुनो — जिसके पाठ या धारण से मनुष्य निश्चय ही ब्रह्मज्ञ हो जाता है।