The Great Liberation Tantra3.67
परमात्मा शिरः पातु हृदयं परमेश्वरः ।
कण्ठं पातु जगत्पाता वदनं सर्वदृग्विभुः ॥६७॥
paramātmā śiraḥ pātu hṛdayaṃ parameśvaraḥ |
kaṇṭhaṃ pātu jagatpātā vadanaṃ sarvadṛgvibhuḥ ||67||
— परमात्मा ; — सिर की ; — रक्षा करे ; — हृदय की ; — परमेश्वर ; — कण्ठ की ; — रक्षा करे ; — जगत्पाता ; — मुख की ; — सर्वदर्शी विभु परमात्मा मेरे सिर की रक्षा करें, परमेश्वर हृदय की; जगत्पाता कण्ठ की रक्षा करें, सर्वदर्शी विभु मुख की।