The Great Liberation Tantra· 3.52 / 153

The Great Liberation Tantra3.52

3.52
गन्धं दद्यान्महीतत्त्वं पुष्पमाकाशमेव च । धूपं दद्याद्वायुतत्त्वं दीपं तेजः समर्पयेत् । नैवेद्यं तोयतत्त्वेन प्रदद्यात् परमात्मने ॥५२॥
gandhaṃ dadyānmahītattvaṃ puṣpamākāśameva ca | dhūpaṃ dadyādvāyutattvaṃ dīpaṃ tejaḥ samarpayet | naivedyaṃ toyatattvena pradadyāt paramātmane ||52||
— गन्ध रूप में ; — पृथ्वी-तत्त्व अर्पित करे ; — और आकाश को पुष्प रूप में ; — और ; — धूप रूप में ; — वायु-तत्त्व अर्पित करे ; — दीप रूप में ; — तेज (अग्नि) को ; — समर्पित करे ; — नैवेद्य रूप में ; — जल-तत्त्व से ; — प्रदान करे ; — परमात्मा को

गन्ध रूप में पृथ्वी-तत्त्व अर्पित करे, पुष्प रूप में आकाश; धूप रूप में वायु-तत्त्व दे, दीप रूप में तेज (अग्नि) समर्पित करे; और नैवेद्य रूप में जल-तत्त्व परमात्मा को प्रदान करे।