गन्धं दद्यान्महीतत्त्वं पुष्पमाकाशमेव च ।
धूपं दद्याद्वायुतत्त्वं दीपं तेजः समर्पयेत् ।
नैवेद्यं तोयतत्त्वेन प्रदद्यात् परमात्मने ॥५२॥
gandhaṃ dadyānmahītattvaṃ puṣpamākāśameva ca |
dhūpaṃ dadyādvāyutattvaṃ dīpaṃ tejaḥ samarpayet |
naivedyaṃ toyatattvena pradadyāt paramātmane ||52||
गन्ध रूप में पृथ्वी-तत्त्व अर्पित करे, पुष्प रूप में आकाश; धूप रूप में वायु-तत्त्व दे, दीप रूप में तेज (अग्नि) समर्पित करे; और नैवेद्य रूप में जल-तत्त्व परमात्मा को प्रदान करे।