The Great Liberation Tantra· 3.53 / 153

The Great Liberation Tantra3.53

3.53
ततो जप्त्वा महामन्त्रं मनसा साधकोत्तमः । समर्प्य ब्रह्मणे पश्चाद्वहिःपूजां समारभेत् ॥५३॥
tato japtvā mahāmantraṃ manasā sādhakottamaḥ | samarpya brahmaṇe paścādvahiḥpūjāṃ samārabhet ||53||
— तदनन्तर ; — जपकर ; — महामन्त्र को ; — मन से ; — साधकोत्तम ; — समर्पित करके ; — ब्रह्म को ; — तत्पश्चात् बाह्य पूजा को ; — आरम्भ करे

तदनन्तर साधकोत्तम महामन्त्र को मन से जपकर और (उस जप को) ब्रह्म को समर्पित करके, उसके पश्चात् बाह्य पूजा आरम्भ करे।