तारेण तारहीनेन प्रत्येकं सकलं पदम् ।
युग्मयुग्मक्रमेणाऽपि मन्त्रोऽयं विविधो भवेत् ॥३८॥
tāreṇa tārahīnena pratyekaṃ sakalaṃ padam |
yugmayugmakrameṇā'pi mantro'yaṃ vividho bhavet ||38||
प्रणव सहित या प्रणव से रहित, प्रत्येक सम्पूर्ण पद को अलग-अलग, तथा युग्म-युग्म के क्रम से भी (लेने पर) — यह मन्त्र अनेक प्रकार का हो जाता है।