सर्वमन्त्रोत्तमः साक्षाद्धर्मार्थकाममोक्षदः ।
नात्र सिद्धाद्यपेक्षाऽस्ति नारिमित्रादिदूषणम् ॥१४॥
sarvamantrottamaḥ sākṣāddharmārthakāmamokṣadaḥ |
nātra siddhādyapekṣā'sti nārimitrādidūṣaṇam ||14||
यह समस्त मन्त्रों में उत्तम है, साक्षात् धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाला; इसमें न सिद्धि आदि की अपेक्षा है, न अरि-मित्र आदि का दोष।