The Great Liberation Tantra· 3.132 / 153

The Great Liberation Tantra3.132

3.132
उपविश्याऽसने ज्ञानी प्राङ्मुखो वाप्युदङ्मुखः । स्ववामे शिष्यमानीय कारुण्येनाऽवलोकयेत् ॥१३२॥
upaviśyā'sane jñānī prāṅmukho vāpyudaṅmukhaḥ | svavāme śiṣyamānīya kāruṇyenā'valokayet ||132||
— आसन पर बैठकर ; — ज्ञानी (गुरु) ; — पूर्व की ओर मुख करके ; — अथवा उत्तर की ओर मुख करके ; — अपने वाम भाग में ; — शिष्य को ; — लाकर ; — करुणा से ; — देखे

ज्ञानी (गुरु) आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठकर, शिष्य को अपने वाम भाग में लाकर, करुणा से उसकी ओर देखे।