The Great Liberation Tantra3.131
गुरुर्विचार्य विधिवत् यथोक्तं शिष्यलक्षणम् ।
आहूय कृपया दद्यात् सच्छिष्याय महामनुम् ॥१३१॥
gururvicārya vidhivat yathoktaṃ śiṣyalakṣaṇam |
āhūya kṛpayā dadyāt sacchiṣyāya mahāmanum ||131||
— गुरु ; — विचार करके ; — विधिपूर्वक ; — यथोक्त ; — शिष्य-लक्षण को ; — बुलाकर ; — कृपा से ; — दे ; — सत्-शिष्य को ; — महामन्त्र को गुरु यथोक्त शिष्य-लक्षण का विधिपूर्वक विचार करके, (उसे) बुलाकर, कृपा से सत्-शिष्य को महामन्त्र दे।