The Great Liberation Tantra3.133
ततः शिष्यस्य शिरसि ऋषिन्यासपुरःसरम् ।
जपेदष्टशतं मन्त्रं साधकस्येष्टसिद्धये ॥१३३॥
tataḥ śiṣyasya śirasi ṛṣinyāsapuraḥsaram |
japedaṣṭaśataṃ mantraṃ sādhakasyeṣṭasiddhaye ||133||
— तदनन्तर ; — शिष्य के ; — सिर पर ; — ऋषि-न्यास पूर्वक ; — एक सौ आठ बार जपे ; — मन्त्र को ; — साधक के अभीष्ट की सिद्धि के लिए तदनन्तर शिष्य के सिर पर, ऋषि-न्यास पूर्वक, साधक के अभीष्ट की सिद्धि के लिए मन्त्र को एक सौ आठ बार जपे।