The Great Liberation Tantra· 2.13 / 54

The Great Liberation Tantra2.13

2.13
मूढो मन्मतमुत्सृज्य योऽन्यन्मतमुपाश्रयेत् । ब्रह्महा पितृहा स्त्रीघ्नः स भवेन्नात्र संशयः ॥१३॥
mūḍho manmatamutsṛjya yo'nyanmatamupāśrayet | brahmahā pitṛhā strīghnaḥ sa bhavennātra saṃśayaḥ ||13||
— मूढ़ ; — मेरे मत को ; — छोड़कर ; — जो ; — अन्य मत का ; — आश्रय ले ; — ब्रह्महत्यारा ; — पितृहत्यारा ; — स्त्रीहत्यारा ; — वह ; — हो जाता है ; — इसमें नहीं ; — संशय

जो मूढ़ मेरे मत को छोड़कर अन्य मत का आश्रय लेता है, वह ब्रह्महत्या, पितृहत्या और स्त्रीहत्या के (पाप के) समान हो जाता है — इसमें कोई संशय नहीं।