Vijñāna Bhairava Tantra · 1.53

Vijñāna Bhairava Tantra 1.53

1.53
वस्त्वन्तरे वेद्यमाने सर्ववस्तुषु शून्यता । तामेव मनसा ध्यात्वा विदितोऽपि प्रशाम्यति ॥५३॥
vastvantare vedyamāne sarvavastuṣu śūnyatā | tām eva manasā dhyātvā vidito'pi praśāmyati
anuṣṭubh
— किसी एक वस्तु में (अधिकरण कारक) ; — ज्ञात होने पर (सति-सप्तमी) ; — सब वस्तुओं में (अधिकरण बहुवचन — समासगत) ; — शून्यता (कर्ता कारक) ; — उसी (शून्यता) को (कर्म कारक स्त्रीलिङ्ग) ; — मन से ध्यान करके (करण + क्त्वान्त) ; — विदित (ज्ञेय) भी प्रशान्त हो जाता है — कर्ता + क्रिया

किसी एक वस्तु के ज्ञात होने पर सब वस्तुओं में शून्यता (प्रतीत होती है); उसी (शून्यता) को मन से ध्यान करके — विदित (ज्ञेय) भी प्रशान्त हो जाता है। (धारणा ३५)