Vijñāna Bhairava Tantra · 1.52

Vijñāna Bhairava Tantra 1.52

1.52
भक्त्युद्रेकाद्विरक्तस्य यादृशी जायते मतिः । सा शक्तिः शाङ्करी नित्यं भवयेत्तां ततः शिवः ॥५२॥
bhaktyudrekād viraktasya yādṛśī jāyate matiḥ | sā śaktiḥ śāṅkarī nityaṃ bhavayet tāṃ tataḥ śivaḥ
anuṣṭubh
— भक्ति के उद्रेक (अतिशय) से (अपादान — समासगत) ; — विरक्त (वैराग्ययुक्त) साधक की — षष्ठी एकवचन ; — जिस प्रकार की (सम्बन्धवाचक स्त्रीलिङ्ग) ; — उत्पन्न होती है (कर्मवाच्य वर्तमान) ; — मति, बुद्धि (कर्ता कारक) ; — वह शाङ्करी शक्ति है — कर्ता कारक ; — नित्य, सदैव (अव्यय) ; — उसकी भावना करे (कर्म + विधि लिङ्) ; — उसी से (वह) शिव हो जाता है — अव्यय + कर्ता कारक

भक्ति के उद्रेक (अतिशय) से विरक्त साधक की जैसी भी मति उत्पन्न होती है — वही शाङ्करी शक्ति है; उसकी नित्य भावना करे, उसी से (वह) शिव हो जाता है। (धारणा ३४)