Vijñāna Bhairava Tantra · 1.155

Vijñāna Bhairava Tantra 1.155

1.155
यत्र यत्र कथञ्चित्तु कर्तृकर्मविविक्तता । तत्र तत्र शिवावस्था व्यापकत्वात्क्व यास्यति ॥१५५॥
yatra yatra kathañcit tu kartṛkarmaviviktatā | tatra tatra śivāvasthā vyāpakatvāt kva yāsyati
anuṣṭubh
— जहाँ-जहाँ (अव्यय-युग्म) ; — किसी भी प्रकार से (अव्यय) ; — कर्ता-कर्म का विवेक/पृथक्करण (कर्ता कारक — समासगत) ; — वहाँ-वहाँ (अव्यय-युग्म) ; — शिव-अवस्था (कर्ता — समासगत) ; — व्यापकता के कारण (अपादान कारक) ; — कहाँ जा सकेगी? (प्रश्न + भविष्यत्)

जहाँ-जहाँ किसी भी प्रकार से कर्ता और कर्म का विवेक (पृथक्करण/अनासक्ति) हो, वहाँ-वहाँ शिव-अवस्था (विद्यमान) है — (शिव की) व्यापकता के कारण वह कहाँ जा सकती है?