Vijñāna Bhairava Tantra · 1.154

Vijñāna Bhairava Tantra 1.154

1.154
अनेन ज्ञानलाभेन गुरुभावः प्रसीदति । लब्ध्वा यः परमां सिद्धिं समतां याति शङ्करे ॥१५४॥
anena jñānalābhena gurubhāvaḥ prasīdati | labdhvā yaḥ paramāṃ siddhiṃ samatāṃ yāti śaṅkare
anuṣṭubh
— ज्ञान-लाभ से (अपादान — समासगत) ; — गुरु-भाव, गुरु की प्रसन्नता (कर्ता कारक — समासगत) ; — समता, एकात्म्य (कर्म कारक)

इस ज्ञान-लाभ से गुरु-भाव प्रसन्न होता है; जो परम सिद्धि प्राप्त करके शङ्कर के साथ समता (एकात्म्य) को प्राप्त होता है।