Vijñāna Bhairava Tantra · 1.153

Vijñāna Bhairava Tantra 1.153

1.153
अनाख्यातमिदं तन्त्रं भोगमोक्षविधायकम् । अनाख्यातमिदं तन्त्रं तेभ्यो दत्तं हि लीलया ॥१५३॥
anākhyātam idaṃ tantraṃ bhogamokṣavidhāyakam | anākhyātam idaṃ tantraṃ tebhyo dattaṃ hi līlayā
anuṣṭubh
— अनाख्यात (अकथित) यह तन्त्र (कर्ता कारक) ; — भोग-मोक्ष-विधायक, भोग और मोक्ष देने वाला (समासगत विशेषण) ; — अनाख्यात यह तन्त्र (कर्ता कारक — पुनरुक्त) ; — उन्हें दिया गया है (कर्म + कर्मवाच्य भूत कृदन्त) ; — लीलापूर्वक ही (करण + अव्यय)

यह तन्त्र अनाख्यात (किसी को न कहा गया) है, और भोग तथा मोक्ष — दोनों का विधायक है; यह अनाख्यात तन्त्र (उन योग्य पात्रों को) लीलापूर्वक प्रदत्त किया गया है।