Vijñāna Bhairava Tantra · 1.151

Vijñāna Bhairava Tantra 1.151

1.151
यथा त्वया कृपाविष्टमिदं रहस्यमुद्धृतम् । तथैव कस्यापि वच्यं श्रोत्रे पात्रे न तत्क्षिपेत् ॥१५१॥
yathā tvayā kṛpāviṣṭam idaṃ rahasyam uddhṛtam | tathaiva kasyāpi vacyaṃ śrotre pātre na tat kṣipet
anuṣṭubh
— जिस प्रकार आपने कृपा से आविष्ट होकर (अव्यय + करण + समासगत भूत कृदन्त) ; — यह रहस्य (कर्ता कारक) ; — उद्धृत, प्रकट किया गया (कर्मवाच्य भूत कृदन्त) ; — उसी प्रकार (अव्यय-युग्म) ; — किसी को वच्य, कहने योग्य (षष्ठी + विशेषण) ; — (अयोग्य) पात्र के कान में (अधिकरण — समासगत) ; — उसे क्षेपण न करे (कर्म + निषेध + विधि लिङ्)

जिस प्रकार आपने कृपा से आविष्ट होकर यह रहस्य उद्धृत (प्रकट) किया, उसी प्रकार यह किसी को कहने योग्य है — किन्तु अयोग्य पात्र (कान) में इसका क्षेपण न करना चाहिए।