The Essence of the Tantra· 4.20 / 46

The Essence of the Tantra4.20

4.20

द्वैताधिवासो ऽपि नाम न कश्चन पृथक् वस्तुभूतः अपि तु स्वरूपाख्यातिमात्रं तत् अतो द्वैतापासनं विकल्पेन क्रियत इत्य् उक्तेः

Transliteration (IAST)

dvaitādhivāso 'pi nāma na kaścana pṛthak vastubhūtaḥ api tu svarūpākhyātimātraṃ tat ato dvaitāpāsanaṃ vikalpena kriyata ity ukteḥ

— द्वैत का अधिवास — द्वैत का अवशिष्ट संस्कार ; — पृथक् वस्तुभूत — अलग से विद्यमान वास्तविक वस्तु ; — स्वरूप की अख्याति-मात्र (अप्रत्यभिज्ञा-मात्र) ; — द्वैत का अपासन — द्वैत का दूरीकरण ; — विकल्प के द्वारा किया जाता है ; — कथन से, उक्ति से

द्वैत का अधिवास भी कोई पृथक् वस्तुभूत नहीं है, अपितु वह केवल स्वरूप की अख्याति (अप्रत्यभिज्ञा) मात्र है; अतः द्वैत का अपासन विकल्प के द्वारा किया जाता है — ऐसा कहा गया।