The Essence of the Tantra· 20.7 / 65

The Essence of the Tantra20.7

20.7

नैमित्तिकम् ज्ञानलाभः शास्त्रलाभो गुरुतद्वर्गगृहागमनं तदीयजन्मसंस्कारप्रायणदिनानि लौकिकोत्सवः शास्त्रव्याख्या आदिमध्यान्ता देवतादर्शनं मेलकं स्वप्नाज्ञा समयनिष्कृतिलाभः इत्य् एतत् नैमित्तिकं विशेषार्चनकारणम्

Transliteration (IAST)

naimittikam jñānalābhaḥ śāstralābho gurutadvargagṛhāgamanaṃ tadīyajanmasaṃskāraprāyaṇadināni laukikotsavaḥ śāstravyākhyā ādimadhyāntā devatādarśanaṃ melakaṃ svapnājñā samayaniṣkṛtilābhaḥ ity etat naimittikaṃ viśeṣārcanakāraṇam

— ज्ञान-लाभ ; — शास्त्र-लाभ ; — गुरु अथवा उसके वर्ग का गृह में आगमन ; — उनके जन्म, संस्कार एवं प्रायण (मरण) के दिन ; — लौकिक उत्सव ; — शास्त्र-व्याख्या के आदि-मध्य-अन्त ; — देवता-दर्शन ; — मेलक (साधकों/योगिनियों की सभा) ; — स्वप्न-आज्ञा (स्वप्न में प्राप्त आदेश) ; — समय-निष्कृति का लाभ (व्रत-भंग से मुक्ति) ; — विशेष-अर्चन का कारण

नैमित्तिक — ज्ञान-लाभ, शास्त्र-लाभ, गुरु अथवा उसके वर्ग का गृह में आगमन, उनके जन्म, संस्कार एवं प्रायण (मरण) के दिन, लौकिक उत्सव, शास्त्र-व्याख्या के आदि-मध्य-अन्त, देवता-दर्शन, मेलक (सभा), स्वप्न-आज्ञा, समय-निष्कृति का लाभ — यह नैमित्तिक विशेष-अर्चन का कारण है।