एवं जालप्रयोगाकृष्टो जीवो दार्भं जातीफलादि वा शरीरं समाविष्टो भवति न च स्पन्दते मनःप्रणादिसामग्र्यभावात् तदनुध्यानबलात् तु स्पन्दते ऽपि तादृशे ऽपि तस्मिन् पूर्ववत् प्रोक्षणादिसंस्कारः पूर्णाहुतियोजनिकान्तः
Transliteration (IAST)
evaṃ jālaprayogākṛṣṭo jīvo dārbhaṃ jātīphalādi vā śarīraṃ samāviṣṭo bhavati na ca spandate manaḥpraṇādisāmagryabhāvāt tadanudhyānabalāt tu spandate 'pi tādṛśe 'pi tasmin pūrvavat prokṣaṇādisaṃskāraḥ pūrṇāhutiyojanikāntaḥ
इस प्रकार जाल-प्रयोग से आकृष्ट जीव दार्भ (कुश-निर्मित) अथवा जातीफल (जायफल) आदि शरीर में समाविष्ट हो जाता है, और स्पन्दित नहीं होता, क्योंकि मन, प्राण आदि सामग्री का अभाव है; किन्तु उसके अनुध्यान के बल से वह स्पन्दित भी होता है। वैसे (समाविष्ट) उस पर भी पूर्ववत् प्रोक्षण आदि संस्कार, पूर्णाहुति-योजनिका-अन्त-पर्यन्त (किया जाता है)।