The Essence of the Tantra· 13.15 / 101

The Essence of the Tantra13.15

13.15

अगुप्ते तु बहिःस्थाने सति प्रविश्य मण्डलस्थण्डिलाग्र एव बाह्यपरिवारद्वारदेवताचक्रपूजां पूर्वोक्तं च न्यासादि कुर्यात् न बहिः

Transliteration (IAST)

agupte tu bahiḥsthāne sati praviśya maṇḍalasthaṇḍilāgra eva bāhyaparivāradvāradevatācakrapūjāṃ pūrvoktaṃ ca nyāsādi kuryāt na bahiḥ

— बाह्य-स्थान अगुप्त (असुरक्षित) होने पर ; — प्रवेश कर के ; — मण्डल-स्थण्डिल के आगे ; — बाह्य-परिवार एवं द्वार-देवता-चक्र की पूजा ; — न्यास आदि ; — बाहर नहीं

किन्तु बाह्य-स्थान अगुप्त (असुरक्षित) होने पर, प्रवेश कर के, मण्डल-स्थण्डिल के आगे ही बाह्य-परिवार एवं द्वार-देवता-चक्र की पूजा तथा पूर्वोक्त न्यास आदि करे, बाहर नहीं।