Stanzas on the Divine Pulsation · 3.4

Stanzas on the Divine Pulsation 3.4

3.4
यथा ह्यर्थोऽस्फुटो दृष्टः सावधानेऽपि चेतसि । भूयः स्फुटतरो भाति स्वबलोद्योगभावितः ॥४॥
yathā hy artho 'sphuṭo dṛṣṭaḥ sāvadhāne 'pi cetasi | bhūyaḥ sphuṭataro bhāti sva-balodyoga-bhāvitaḥ ||
anuṣṭubh
— जैसे, जिस प्रकार (सम्बन्धवाचक अव्यय) ; — क्योंकि, निश्चय ही (हेत्वर्थक अव्यय) ; — अर्थ — पदार्थ, विषय (कर्ता कारक) ; — अस्फुट — अस्पष्ट (विशेषण, कर्ता कारक) ; — देखा गया (पु.कर्ता एक. ppp √दृश्) ; — सावधान चित्त में (अधिकरण कारक — पदबन्ध) ; — भी (अव्यय) ; — पुनः, बार-बार (अव्यय) ; — स्फुटतर — अधिक स्पष्ट (विशेषण, कर्ता कारक) ; — प्रकाशित होता है, भासित होता है (वर्त. तृ.पु.एक. √भा) ; — स्वबल के उद्योग से भावित — अपनी (आन्तर) शक्ति के प्रयत्न से अनुप्राणित (कर्ता कारक — समासगत)

जैसे कोई अर्थ सावधान चित्त में भी पहले अस्पष्ट दिखाई देता है, परन्तु अपने आन्तर बल के उद्योग से भावित होकर पुनः अधिक स्पष्ट रूप से भासित होता है —